Friday, December 3, 2010

रम में रमता गया

सुनाता सबकी गया करता अपनी गया ,
ना जाने क्यों मै अपनी राम में रमता गया
सोच था  कुछ और करूँगा पर,
ना जाने क्यूँ मै अपने पथ से भटकता गया 
अब यहाँ हूँ जैसे भी हूँ ,
नाखुश होकर भी खुश होता गया 
दूर रहकर भी अजनबियों के करीब होता गया ,
धीरे - धीरे अपनो से दूर होता गया 
'आशू'  गिरकर भी ना संभल पाये,
आकर यहाँ पर यही गाता गया |
ना जाने क्यूँ  मै अपनी रम में रमता गया .........
.................(आशू शुक्ल )